बिल्हौर की जनता करे पुकार, क्षेत्रीय विधायक चाहिए इसबार


राहुल त्रिपाठी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 की सरगर्मी लगातार बढ़ती जा रही है कानपुर नगर जनपद के बिल्हौर में भी यही हाल है। बिल्हौर जिला मुख्यालय से 60 किमी दूर सुरक्षित बिल्हौर विधानसभा से अभी तक पहली मर्तबा बृजरानी देवी को मनोनयन से शेष 16 विधायकों को यहां की जनता ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनकर विधानसभा भेजा, लेकिन कुल 17 विधायकों में से एक भी विधायक बिल्हौर विधानसभा क्षेत्र का निवासी नहीं है। 
                  आरक्षण और बाहरी प्रत्याशी के बोझ से बिल्हौर में विकास की रफतार पड़ी धीमी
                    बाहर से आए दावेदार प्रत्याशी बने और जनता का विश्वास जीतकर विधायक बने, यह प्रक्रिया आजादी के बाद से अभी तक लगातार जारी है। बिल्हौर विधानसभा का कई बार परिसीमन हुआ, लेकिन आरक्षण की व्यवस्था जस की तस है और तो और बिल्हौर से सटी रसूलाबाद, कन्नौज की सीटें भी सुरक्षित हैं, जबकि चौबेपुर विधानसभा समाप्त होकर बिठूर सामान्य सीट हो चुकी है।
बिल्हौर की जनता को आजतक नहीं मिल सका क्षेत्रीय विधायक
                       वर्ष 1957 में बिल्हौर विधानसभा में सबसे पहले बृजरानी देवी का मनोनयन हुआ था, जबकि इसी साल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मुरलीधर कुरील मतदान के बाद चुने गए थे, वह मूलरूप से कानपुर के निवासी थे और 1962 में भी निर्वाचित हुए। 1967, 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के मोती लाल देहलवी विधायक चुने गए। राजनैतिक फेरबदल के बाद भारतीय क्रांति दल से 1974 में जनता पार्टी से 1977 में, 1980 में जनता पार्टी धर्म निरपेक्ष से और 1989 में जनता से से वह विधायक है। इसी बीच 1985 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से हनुमान प्रसाद कुरील विजयी हुए। उक्त सभी का जुड़ाव-निवास कानपुर शहर ही रहा। वर्ष 1991 सबसे पहले शिव कुमार बेरिया जनता पार्टी से चुनाव जीतकर लखनऊ विधानसभा पहुंचे, इसके बाद 1993 में सपा से भी वह बिल्हौर से जीतकर विधायक बने। 1996 में बीएसपी भगवती प्रसाद सागर, 2002 में सपा से शिव कुमार बेरिया निवासी कानपुर शहर, 2007 में बीएसपी से कमलेश चंद्र दिवाकर निवासी बांगरमऊ, उन्नाव, 2012 में सपा से अरुणा कुमारी कोरी निवासी कानपुर शहर और 2017 में भाजपा से भगवती प्रसाद सागर बिल्हौर से जीतकर विधायक बने। उक्त सभी जो भी बिल्हौर से विधायक बने उन्होंने क्षेत्रीय होने के लिए चुनाव के दौरान किराए पर घर-मकान लिए, व्यापार किया, गेस्ट हाउस खोले और तरह-तरह आडंबर भी किए, लेकिन परिवार के साथ कभी बिल्हौर में निवासी नहीं किया। 
               बाहरी शहरों, जिलों और पार्टी के थोपे गए प्रत्याश‌ी को मिलती रही जीत
                                        2022 के विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय प्रत्याशी का मुद्दा बहुत तेजी से गरमाया हुआ है, दबी जुबान से लोग आरक्षण व्यवस्था को भी कोस रहे हैं, आने वाली 10 मार्च को बिल्हौर के 3.90 हजार मतदाता क्या निर्णय लेते हैं इसका खुलासा हो सकेगा, अभी तक बिल्हौर की जनता मुख्यमंत्री बनाने वाली पार्टी के साथ ज्यादा रही है।
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लगातार अलग-अलग क्षेत्रों में बिखर रही बिल्हौर की जनता
बिल्हौर परिसीमन के बाद बिल्हौर लोकसभा का एक बड़ा हिस्सा अब अकबरपुर लोकसभा, कन्नौज लोकसभा में पहुंच चुका है। बिल्हौर विधानसभा का भी एक बड़ा हिस्सा रसूलाबाद विधानसभा के रूप में कट चुका हैं, वर्ष 2004 तक बिल्हौर लोकसभा और तहसील क्षेत्र की चौबेपुर विधानसभा का भी अस्तिव समाप्त हो चुका है। जातीय आंकड़ों, भौगोलिक ‌स्थित और स्थानीय बड़े नेताओं के अभाव में बिल्हौर की जनता लगातार बिखरी जा रही हैं और लगातार चुने जा रहे प्रतिनिधियों से आशाएं लगाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत भी विकास की बयार की टकटकी लगाए है।

टिप्पणियाँ

हरिनाथ यादव ने कहा…
बिल्हौर विधानसभा का राहुल त्रिपाठी जी द्वारा पूरा इतिहास विधिवत लिखा गया है कहीं ना कहीं से आरक्षण इस विधानसभा के विकास का दोष मानता है इसके चलते कोई विकास नहीं हुआ मौजूदा विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे को जनता और कार्यकर्ताओं ने जोर-शोर से उठाया है कि स्थानीय प्रत्याशी होना चाहिए सभी पार्टियां इस पर काम भी कर रही है अभी कौन पार्टी कितना खरा उतरती है स्थानी को टिकट देकर जनता जीता कर विधानसभा भेजती है तब कहीं जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगा स्थानीय विधायक होने के नाते क्या-क्या विकास कराएगा जनता मानती है कि स्थानी होने पर उसके दरवाजे चक्कर लगाएंगे 10 बार तो एक बार तो काम करेगा ही क्योंकि उसके दरवाजे स्थानीय लोग अक्सर मौजूद मिलेंगे तो उनके सामने जलील होगा तो जरूर काम करेगा

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